
क्या अब जबलपुर में एक साधारण नागरिक को FIR दर्ज करवाने के लिए सीधे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जाना पड़ेगा? जमीन धोखाधड़ी के एक मामले में यही तस्वीर सामने आई है, जहां हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद भी बरेला थाना पुलिस ने महीनों तक रिपोर्ट दर्ज नहीं की। और जब दर्ज की, तो शिकायत में शामिल 6 नामों में से 5 को ‘एडिट’ कर दिया गया।
20 अगस्त 2025 को हाईकोर्ट ने संज्ञेय अपराध पाए जाने पर कार्रवाई के निर्देश दिए।
पुलिस ने 23 फरवरी 2026 को अवमानना याचिका दायर होने पर FIR दर्ज
शिकायत में 6 नाम थे, लेकिन FIR में केवल शुभम चौबे को आरोपी बनाया गया
कोर्ट के दबाव में दर्ज FIR, किसी की नहीं हुई गिरफ्तारी।
जबलपुर में यह सवाल अब आम चर्चा का विषय है कि क्या थानों में FIR दर्ज करवाना इतना मुश्किल हो गया है कि पीड़ित को पहले हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़े? बृजेश दुबे ने जमीन धोखाधड़ी की शिकायत की थी, लेकिन स्थानीय स्तर पर कार्रवाई न होने के बाद उन्हें हाईकोर्ट जाना पड़ा। अदालत ने स्पष्ट कहा कि शिकायत में संज्ञेय अपराध बनता है तो कानून के तहत कार्रवाई की जाए।
इसके बावजूद बरेला पुलिस ने लगभग छह महीने तक कोई कदम नहीं उठाया। जब अवमानना याचिका की तलवार लटकती दिखी, तब 23 फरवरी 2026 को FIR दर्ज की गई। सवाल यह है कि क्या पुलिस को कानून का पालन करने के लिए भी कोर्ट की चेतावनी जरूरी है?
6 आरोपी, FIR में सिर्फ 1 पर, बाकी पर मेहरबानी
पीड़ित की शिकायत में शुभम चौबे के साथ राजेश खुल्लर, शांति लाल जैन, विध्या जैन, मिथुन दुबे और संगीता खुल्लर को भी कथित साजिश का हिस्सा बताया गया था। आरोप था कि जमीन के पावर ऑफ अटॉर्नी और बाद की रजिस्ट्री में सभी की भूमिका रही।
लेकिन FIR में सिर्फ शुभम चौबे का नाम जोड़ा गया। बाकी पांच नाम किस आधार पर हटाए गए, इस पर पुलिस की ओर से कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। क्या यह जांच का हिस्सा है या ‘चयनात्मक’ कार्रवाई? यह सवाल अब खुलकर उठ रहे हैं।
जमीन सौदे से कथित धोखाधड़ी तक
मामले के अनुसार, बृजेश दुबे ने वर्ष 2014 में ग्राम सिलुआ में जमीन खरीदी थी। वर्ष 2018 में आर्थिक जरूरत के चलते परिचित से उधार लिया। आरोप है कि भारी ब्याज और दबाव के बीच जमीन का मुख्तयारनामा कराया गया और बाद में रजिस्ट्री कर ली गई।यदि शिकायत में सामूहिक साजिश का आरोप था, तो फिर जांच की दिशा एक ही नाम तक सीमित क्यों कर दी गई?
FIR के बाद भी गिरफ्तारी नहीं
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि FIR दर्ज होने के बाद भी मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि आरोपी क्षेत्र में खुला घूम रहा है।भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(2), 308(3) और 318(4) के तहत मामला दर्ज होने के बावजूद पुलिस की कार्रवाई सुस्त क्यों है?
जनता पूछ रही है, कानून बड़ा या रसूख?
यह मामला अब सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं रहा। यह सवाल बन चुका है कि क्या आम नागरिक को न्याय पाने के लिए पहले हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ेगी?FIR दर्ज कराने में देरी, आरोपियों की सूची में कटौती और गिरफ्तारी में ढिलाई, इन सबने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अब देखना यह है कि क्या जांच निष्पक्ष दिशा में आगे बढ़ेगी या यह मामला भी कागजों तक सीमित रह जाएगा।



