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शुक्रवार, जनवरी 23, 2026
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वरिष्ठ अधिमान्य पत्रकार के खिलाफ पुलिस कर्मी रच रहे साजिश, एक सस्पेंड दूसरा लाइन अटैच

जबलपुर में वरिष्ठ पत्रकार विलोक पाठक को “निपटाने” की धमकी देने का वीडियो सामने आने के बाद पत्रकारिता की सुरक्षा और पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने पूरे शहर में आक्रोश फैला दिया है। श्रमजीवी पत्रकार परिषद ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए FIR और निलंबन की मांग की है।

वायरल वीडियो से मचा बवाल

पिछले 24 घंटों से सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने जबलपुर में सनसनी फैला दी है, जिसमें दो वर्दीधारी पुलिसकर्मी वरिष्ठ पत्रकार विलोक पाठक के खिलाफ खुलेआम अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए उन्हें “निपटाने” और मारने की धमकी देते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो सामने आते ही संस्कारधानी के पत्रकारों, सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों में तीव्र आक्रोश फैल गया। इसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला बताया जा रहा है।

लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला

श्रमजीवी पत्रकार परिषद और अन्य पत्रकार संगठनों ने इस घटना को प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर गंभीर प्रहार करार दिया। परिषद का कहना है कि जिन पुलिसकर्मियों पर कानून-व्यवस्था और समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, यदि वही बदमाशों की भाषा में पत्रकारों को धमकाने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति है।

एसपी से मुलाकात, FIR और निलंबन की मांग

इस मामले को लेकर श्रमजीवी पत्रकार परिषद ने विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज करने, निलंबन और सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग रखी। परिषद ने स्पष्ट कहा कि यह घटना सुनियोजित प्रतीत होती है और इसका उद्देश्य पत्रकार को डराना व दबाव में लेना है।

BNS की सख्त धाराओं हो कार्रवाई

परिषद द्वारा भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करने की मांग की गई, जिनमें आपराधिक षड्यंत्र, आपराधिक धमकी, उकसावे, लोक सेवक द्वारा कानून की अवहेलना और समान इरादे से अपराध जैसी धाराएं शामिल हैं। परिषद का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह भविष्य में और भी खतरनाक उदाहरण बन सकता है।

पुलिस अधीक्षक का त्वरित एक्शन

पत्रकारों के आक्रोश और मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ने तत्काल कार्रवाई करते हुए संबंधित दो पुलिसकर्मियों में से एक को लाइन हाजिर और दूसरे को निलंबित कर दिया है। साथ ही FIR के संबंध में जांच कर शीघ्र आगे की कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है।

राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी

बैठक के दौरान परिषद के राष्ट्रीय, प्रदेश, संभागीय और जिला स्तर के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो आंदोलन जबलपुर तक सीमित नहीं रहेगा। पूरे मध्यप्रदेश के पत्रकार संगठन एकजुट होकर व्यापक आंदोलन करेंगे, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की होगी।

पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

वायरल वीडियो में पुलिसकर्मियों द्वारा यह कहते सुना गया कि यदि कोतवाली थाना क्षेत्र के लाठीचार्ज के दौरान पत्रकार विलोक पाठक मौजूद होते, तो उन्हें “निपटा दिया जाता।” यह बयान दर्शाता है कि निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को अब केवल असामाजिक तत्वों से नहीं, बल्कि कुछ पुलिसकर्मियों से भी खतरा बढ़ता जा रहा है। खासकर अवैध गतिविधियों और संरक्षण देने वाले तंत्र को उजागर करने वाली पत्रकारिता पर यह सीधा हमला माना जा रहा है।

सबकी निगाहें अब पुलिस कार्रवाई पर

फिलहाल पूरा पत्रकार जगत और समाज की नजरें पुलिस प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। यह मामला अब केवल एक पत्रकार की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोकतंत्र, कानून और प्रेस की स्वतंत्रता की कसौटी बन चुका है।

भेड़ाघाट के सहजपुर में ट्रेवल्स संचालक की दिनदहाड़े चाकू मारकर हत्या, ओवरब्रिज के नीचे वारदात से सनसनी

जबलपुर जिले के भेड़ाघाट थाना क्षेत्र अंतर्गत सहजपुर में दिनदहाड़े हुई एक सनसनीखेज हत्या ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी। ट्रैवल संचालक युवक पाटन का निवासी था, जो घर से उज्जैन जाने का बता कर निकला था।

भेड़ाघाट थाना क्षेत्र अंतर्गत शाहपुरा सहजपुर ब्रिज के पास में दिनदहाड़े हुई एक सनसनीखेज हत्या ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी। अज्ञात बदमाशों ने एक युवक पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर उसकी मौके पर ही हत्या कर दी। वारदात के बाद आरोपी फरार हो गए, जबकि सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी गई।

ओवरब्रिज के नीचे मिला युवक का खून से लथपथ शव

घटना सहजपुर ओवरब्रिज के नीचे की है, जहां स्थानीय लोगों ने एक युवक को गंभीर हालत में पड़ा देखा। पास जाकर देखने पर युवक खून से लथपथ था और उसके शरीर पर चाकू के कई वार के निशान थे। सूचना मिलते ही भेड़ाघाट थाना पुलिस मौके पर पहुंची, क्षेत्र को घेरा गया और पंचनामा कार्रवाई के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कॉलेज अस्पताल भिजवाया गया।

ट्रैवल संचालक है मृतक, पाटन का निवासी बताया जा रहा

पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार मृतक की पहचान अभिषेक उर्फ महेंद्र साहू (उम्र लगभग 27 वर्ष) के रूप में हुई है, जो पाटन थाना क्षेत्र का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक जानकारी में सामने आया है कि युवक ट्रेवल्स के व्यवसाय से जुड़ा हुआ था। परिजनों के अनुसार वह घर से उज्जैन जाने की बात कहकर निकला था, लेकिन रास्ते में यह खौफनाक वारदात हो गई।

दिनदहाड़े हत्या से इलाके में दहशत, कई सवाल खड़े

दिन के उजाले में ओवरब्रिज के नीचे हुई इस निर्मम हत्या से क्षेत्र में भय का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की वारदात से कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। हत्या के पीछे रंजिश, लूट या कोई अन्य कारण है—इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं, हालांकि पुलिस ने अभी किसी भी कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

सीसीटीवी में कैद आरोपियों की तलाश में जुटी पुलिस, जांच जारी

भेड़ाघाट थाना पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है। घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच की जा रही है और मृतक के संपर्कों को भी खंगाला जा रहा है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही पूरे मामले का खुलासा कर आरोपियों को गिरफ्तार किया जाएगा।

जबलपुर के बाद सिहोरा में भी अवैध शराब के खिलाफ महिलाओं का उबाल, सड़क पर फोड़ी बोतलें

खमरिया, खिरवा और बरगी गांव की महिलाओं ने शराब बेचने आए व्यक्ति को घेरकर बोतलें छीन लीं और बीच सड़क तोड़ दीं।महिलाओं ने प्रशासन को बड़ा आंदोलन करने की चेतावनी भी दी है।

@फैज़ वारसी जबलपुर के बाद अब सिहोरा क्षेत्र में भी अवैध शराब के खिलाफ महिलाओं का आक्रोश खुलकर सड़क पर दिखा। सिहोरा के खमरिया, खिरवा और बरगी गांव की महिलाओं ने शराब बेचने आए व्यक्ति को घेरकर बोतलें छीन लीं और बीच सड़क तोड़ दीं। महिलाओं ने चेतावनी दी है कि यदि अवैध शराब पर रोक नहीं लगी तो जिला स्तर पर बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

महिलाओं और बच्चों ने बीच सड़क फोड़ी अवैध शराब की बोतलें

सिहोरा क्षेत्र में अवैध शराब के खिलाफ सड़क पर उतरी महिलाएं

सिहोरा थाना क्षेत्र के गांव खमरिया, खिरवा और बरगी में अवैध शराब की बिक्री से परेशान महिलाओं ने गुरुवार को जोरदार प्रदर्शन किया। महिलाओं को सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति एक्टिवा में शराब भरकर गांव में बेचने की तैयारी कर रहा है। सूचना मिलते ही महिलाएं मौके पर पहुंचीं, व्यक्ति को घेर लिया और उसके पास मौजूद शराब छीनकर सड़क पर फेंक दी। प्रदर्शन कर रही महिलायें वीडियो में पुलिस पर भी आरोप लगाते सुनाई दे रही हैं। महिलाओं के अनुसार पुलिस को सूचना देने के बाद भी 2 घंटे तक पुलिस जब कार्यवाही करने नहीं आई तब उन्होंने मामला अपने हाथ में लिया।

बीच सड़क तोड़ी गईं शराब की बोतलें, गूंजे नारे

महिलाओं ने सड़क पर ही शराब की बोतलें फोड़ते हुए जमकर नारेबाजी की। उनका कहना था कि अवैध शराब के कारण गांव का माहौल बिगड़ चुका है, आए दिन विवाद और मारपीट की घटनाएं हो रही हैं। नशे के कारण परिवार तबाह हो रहे हैं और युवा पीढ़ी तेजी से इसकी चपेट में आ रही है।

पहले भी किया था थाने का घेराव, फिर भी नहीं रुका कारोबार

महिलाओं ने बताया कि यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने विरोध दर्ज कराया हो। अक्टूबर महीने में भी शराबबंदी की मांग को लेकर सिहोरा थाना का घेराव किया गया था, लेकिन इसके बावजूद क्षेत्र में अवैध शराब का कारोबार बेरोकटोक जारी रहा। इसी लापरवाही के चलते महिलाओं को अब खुद सड़क पर उतरना पड़ा।

सूचना पर पहुंचा आबकारी और पुलिस अमला, महिलाओं ने लगाए आरोप

प्रदर्शन की सूचना मिलते ही आबकारी विभाग और सिहोरा थाने का स्टाफ मौके पर पहुंचा। बड़ी संख्या में ग्रामीण भी घटनास्थल पर जमा हो गए थे। जब पुलिस के द्वारा इस शराब को जब्त करने की बात की गई, तो महिलाओं ने आरोप लगाए कि सूचना के 2 बाद अधिकारी मौके पर पहुंचे हैं। अधिकरियों ने किसी तरह आक्रोशित महिलाओं को शांत कराया, लेकिन महिलाओं का कहना साफ था कि अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए।

नशे से बिगड़ रहा सामाजिक माहौल

प्रदर्शन कर रहीं महिलाओं का आरोप है कि खमरिया और खिरवा गांव में चारों ओर अवैध शराब बेची जा रही है। शराबियों का जमावड़ा लगा रहता है, जिससे महिलाओं और बच्चों का बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। युवाओं में नशे की लत तेजी से बढ़ रही है और इसका सीधा असर गांव की शांति और सुरक्षा पर पड़ रहा है।

सिंधी कैंप की मौतों का जिक्र हुआ ताज़ा

जबलपुर के सिंधी कैंप इलाके में बीते कुछ महीनों में 19 मौतों के बाद महिलाओं ने एसपी ऑफिस और कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर विरोध दर्ज कराया था। अब आरोप है कि जांच के नाम पर आबकारी विभाग ने केवल औपचारिकता निभाई और यह जानने की कोशिश की गई कि मौतें कितने दिनों में हुईं, न कि यह कि शराब कहां से लाई गई थी। जो जांच की गई इसका मकसद सिर्फ यही नजर आया कि किस तरह से इन मौतों से पुलिस सहित आबकारी विभाग अपना पल्ला झाड़ ले।

FIR के आंकड़ों के सहारे मौतों को छिपाने का प्रयास

इस मामले में जो जांच की गई उसमें आबकारी विभाग ने क्षेत्रीय थाना प्रभारी से पूछा है कि शराब पीने से क्षेत्र में कितनी मौत हुई हैं। जिसका जवाब साफ है कि जिस थाने में अवैध शराब बिक्री ही थाना प्रभारी के संरक्षण में हो रही हो, वहां शराब से मौत के मामले में एफआईआर दर्ज होना तो नामुमकिन ही है। इस क्षेत्र के अवैध शराब बिक्री के कुछ वीडियो भी वायरल हुए है जो पुलिस सहित आबकारी के जिम्मेदारों की पोल खोल रहे हैं।

आबकारी के पंचनामे ही खोल रहे पोल

आबकारी विभाग ने मृतकों के परिजनों से बयान लेकर पंचनामे तैयार किए हैं। बयान में सवाल ही वही पूछे गए जो विभाग का बचाव करते हों। जैसे यह तो पूछा गया कि मृतक को शराब की लत कब से थी। लेकिन यह नहीं पूछा गया कि वह शराब खरीदता किससे था। यहां तक की कई परिजन तो अनपढ़ भी हैं जिन्होंने आबकारी के तथाकथित बयान पर अंगूठे लगाए हैं। आमतौर पर इस बस्ती में निम्न आय वर्ग के लोग रहते हैं, और शराब से मौत होने के बाद यह ना तो पुलिस शिकायत करते हैं ना ही शव का पोस्टमार्टम कराते हैं, इसलिए इस तरह की मौतों के मामले दब कर रह जाते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि आबकारी विभाग के अधिकारियों को क्षेत्र में पड़ी हुई कच्ची शराब की पन्नियां भी नजर नहीं आई। हालांकि यह नजर आती भी कैसे क्योंकि जांच तो सिर्फ मामला दबाने के लिए की गई थी।

नस्ल के लिए काल बन रही अवैध शराब

अब आबकारी विभाग और पुलिस सहित प्रशासन चाहे जितनी सफाई दे जबलपुर के नागरिक जानते हैं कि अवैध शराब बिक्री की असलियत क्या है। जगह-जगह मैदानो से लेकर पार्कों तक में इसके सबूत नज़र आते हैं। लेकिन जब नजरअंदाज करने की ठान ही ली जाए तो फिर कुछ कैसे नज़र आ सकता है। पीड़ित तो बस अब यही दुआ कर रहे हैं कि चंद नोटो के लिए ऐसे व्यापार को नजरअंदाज करने वालों के परिवार पर भी कुछ ऐसा घटे कि उन्हें अपने कर्म याद आ जाएं। अब इन्हें सद्बुद्धि देने के लिए पीड़ितों को भगवान का ही सहारा रह गया है।

कांचघर हत्याकांड का खुलासा: संगम टेंट हाउस के सामने हुई हत्या के 4 आरोपी गिरफ्तार

थाना सिविल लाइन क्षेत्र के कांचघर इलाके में हुई युवक की हत्या के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। जबलपुर में हुई सनसनीखेज हत्या का पुलिस ने किया खुलासा, इलाज के दौरान युवक की मौत के बाद हत्या में बदला मामला, सिविल लाइन पुलिस की त्वरित कार्रवाई से आरोपियों की गिरफ्तारी।

@फैज़ वारसी जबलपुर। थाना सिविल लाइन क्षेत्र के कांचघर इलाके में हुई युवक की हत्या के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। 29 दिसंबर 2025 की शाम करीब 7 बजे संगम टेंट हाउस के सामने मोनू झरिया पर चार युवकों ने चाकू से जानलेवा हमला किया था। गंभीर रूप से घायल मोनू झरिया को उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद मामला हत्या में तब्दील हो गया, जिससे इलाके में सनसनी फैल गई थी।

इलाज के दौरान मोनू झरिया की मौत, हत्या में बदला मामला

घटना की गंभीरता को देखते हुए सिविल लाइन पुलिस ने विशेष टीमों का गठन किया। सीसीटीवी फुटेज, मुखबिरों से मिली सूचना और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने चार आरोपियों को चिन्हित कर गिरफ्तार किया। पकड़े गए आरोपियों में (1) तुषार उर्फ रंगा उर्फ वीरा पिता ब्रजभान चौधरी (18 वर्ष), आर्यन पिता विनोद कुछबंधिया (18 वर्ष), (3) नवीन पिता सलाम गौरी (20 वर्ष) और (4) साहिल पिता मोहन चौधरी (20 वर्ष) शामिल हैं। सभी आरोपी घमापुर थाना क्षेत्र के शीतलामाई और कुचबंधिया मोहल्ला निवासी बताए हैं।

3 आरोपी अभी भी फरार, हथियार और वाहन हुए जब्त

पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से हत्या में प्रयुक्त चाकू और दो मोबाइल फोन भी जब्त किए हैं। इस हत्याकांड में तीन अन्य आरोपी अभी फरार बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश के लिए लगातार दबिश दी जा रही है। पूरे मामले के खुलासे में सिविल लाइन थाना, ओमती थाना और अपराध शाखा की संयुक्त टीम की अहम भूमिका रही।

आरोपियों का निकला जुलूस

पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों को न्यायालय में पेश कर आगे की वैधानिक कार्रवाई शुरू कर दी है। कोर्ट ले जाने के दौरान इन आरोपियों को सड़क से पैदल लेकर जाया गया। इस दौरान आरोपी यह कहते हुए चल रहे थे कि अपराध करना पाप है और पुलिस हमारी बाप है।

विजयवर्गीय के ‘घंटा’ बयान पर कांग्रेस का पलटवार, कलेक्टर कार्यालय में घंटा बजाकर किया विरोध प्रदर्शन

कांग्रेस ने मंत्री के बयान को मीडिया का अपमान बताते हुए, घंटा बजाकर विरोध जताया। मुख्यमंत्री मोहन यादव से तत्काल मंत्री के इस्तीफे की मांग की है।

@फैज़ वारसी (जबलपुर) मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के आपत्तिजनक बयान को लेकर सियासत गरमा गई है। जबलपुर में कांग्रेस ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर घंटा बजाते हुए विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस ने मंत्री के बयान को मीडिया का अपमान बताते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव से तत्काल इस्तीफे की मांग की है।

कलेक्टर कार्यालय में कांग्रेस का प्रतीकात्मक प्रदर्शन

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान के विरोध में कांग्रेस ने जबलपुर के कलेक्टर कार्यालय परिसर में जोरदार प्रदर्शन किया। नगर कांग्रेस अध्यक्ष सौरभ नाटी शर्मा के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे और घंटा बजाकर मंत्री के बयान पर आपत्ति जताई। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह विरोध उसी शब्द के प्रतीकात्मक जवाब के तौर पर है, जिसका प्रयोग मंत्री ने पत्रकार के सवाल पर किया था।

“जिस घंटे की बात कर रहे मंत्री, वही हम बजाकर पूछ रहे सवाल” – सौरभ नाटी शर्मा

कांग्रेस के जबलपुर नगर अध्यक्ष सौरभ नाटी शर्मा ने तीखे शब्दों में कहा कि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पत्रकार के सवाल पर जिस “घंटा” शब्द का इस्तेमाल किया, उसी घंटे को बजाकर कांग्रेस सवाल पूछ रही है। उन्होंने कहा कि उनकी समझ में तो यही घंटा है, लेकिन मंत्री किस घंटे की बात कर रहे थे, यह वही जानें। सौरभ शर्मा ने मंत्री के बिगड़े बोलों की कड़ी निंदा करते हुए इसे लोकतंत्र और मीडिया की गरिमा के खिलाफ बताया।

फ्रस्ट्रेशन में हैं मंत्री – कांग्रेस का आरोप

कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा मंत्री कैलाश विजयवर्गीय उम्र और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के दबाव में फ्रस्ट्रेशन का शिकार हो चुके हैं। कांग्रेस का कहना है कि वह रिटायरमेंट से पहले मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन यह सपना पूरा न होने के कारण वह महिलाओं, बच्चियों और मीडिया कर्मियों से बदसलूकी जैसी हरकतें कर रहे हैं। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री मोहन यादव से मांग की कि ऐसे मंत्री से तत्काल इस्तीफा लिया जाए, ताकि सरकार की छवि और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सके।

क्या है पूरा मामला: इंदौर में दूषित पानी से मौतें

पूरा विवाद इंदौर के भागीरथपुरा इलाके से जुड़ा है, जहां दूषित पेयजल के कारण डायरिया का गंभीर प्रकोप फैल गया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, इस घटना में 8 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 212 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इनमें से करीब 50 मरीज ठीक होकर घर लौट चुके हैं। यह इलाका मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के इंदौर-1 विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

मीडिया के सवाल पर आपा खो बैठे मंत्री

घटना को लेकर बुधवार रात मंत्री कैलाश विजयवर्गीय मीडिया से बातचीत कर रहे थे। शुरुआत में उन्होंने शांतिपूर्वक सवालों के जवाब दिए, लेकिन जब निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों के बिलों के रिफंड और पीने के पानी की वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सवाल पूछा गया, तो वह अचानक नाराज हो गए। इसी दौरान उन्होंने पत्रकार से कहा कि “फालतू सवाल मत पूछो” और बहस के बीच एक आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल कर दिया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

विवाद बढ़ने पर जताया खेद, लेकिन कांग्रेस संतुष्ट नहीं

वीडियो वायरल होने के बाद मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी टीम पिछले दो दिनों से बिना सोए हालात सुधारने में लगी है। हालांकि, कांग्रेस ने इसे पर्याप्त नहीं मानते हुए कहा कि केवल खेद जताना काफी नहीं है। पार्टी का कहना है कि मीडिया के प्रति इस तरह का व्यवहार अस्वीकार्य है और इसके लिए नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

सियासत तेज, आगे और बढ़ सकता है मामला

कांग्रेस के इस प्रदर्शन के बाद प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। एक ओर कांग्रेस इस्तीफे की मांग पर अड़ी है, वहीं दूसरी ओर भाजपा इसे परिस्थितियों का दबाव बता रही है। साफ है कि दूषित पानी से हुई मौतों का मामला अब प्रशासनिक संकट से निकलकर बड़े राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है।

28 दिन तक रिटायर्ड प्रोफेसर को रखा डिजिटल अरेस्ट, ठगी में जबलपुर कनेक्शन बेनकाब

रतलाम में सामने आए ‘डिजिटल अरेस्ट’ के सनसनीखेज साइबर ठगी मामले ने जबलपुर तक अपनी जड़ें फैला दी हैं। रिटायर्ड प्रोफेसर से 1.34 करोड़ की ठगी में जबलपुर के आरोपियों की अहम भूमिका उजागर हुई है। एसपी अमित कुमार के निर्देशन में रतलाम पुलिस ने अब तक 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर बड़ा नेटवर्क तोड़ा है।

फैज वारसी (जबलपुर) रतलाम के दीनदयाल नगर थाना क्षेत्र में सामने आए इस हाई-प्रोफाइल साइबर क्राइम में आरोपियों ने खुद को मुंबई क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताकर रिटायर्ड प्रोफेसर को डिजिटल अरेस्ट में रखा। लगातार वीडियो कॉल, फर्जी कोर्ट कार्यवाही और गिरफ्तारी की धमकी देकर पीड़ित को 28 दिनों तक मानसिक रूप से बंधक बनाए रखा गया। इसी दबाव में उनसे अलग-अलग बैंक खातों में 1 करोड़ 34 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए।

जबलपुर के खातों से हुआ लाखों का लेनदेन

जांच के दौरान रतलाम पुलिस को ठगी की रकम का अहम ट्रेल जबलपुर से मिला। यहां से अशोक जायसवाल, सनी जायसवाल और सारांश तिवारी सहित एक नाबालिग को गिरफ्तार किया गया। पुलिस जांच में सामने आया कि इन आरोपियों के बैंक खातों में लाखों रुपये का संदिग्ध लेनदेन हुआ था, जो सीधे ठगी की रकम से जुड़ा हुआ है। इन खातों का इस्तेमाल आगे क्रिप्टोकरेंसी खरीदने में किया गया।

अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का हिस्सा थे आरोपी

एसपी अमित कुमार के निर्देशन में गठित 18 सदस्यीय SIT की जांच में खुलासा हुआ कि यह कोई अकेली वारदात नहीं, बल्कि संगठित अंतरराज्यीय साइबर गिरोह है। गिरोह के तार कश्मीर, गुजरात, बिहार, असम और मध्य प्रदेश से जुड़े हैं। ठगी की रकम सूरत के रास्ते क्रिप्टोकरेंसी में बदली गई और कंबोडिया तक पहुंचाई गई।

जबलपुर से लेकर गुजरात-बिहार तक गिरफ्तारी

पुलिस ने जबलपुर के आरोपियों के अलावा नीमच से पवन कुमावत, उत्तर प्रदेश से NGO संचालक अमरेन्द्र मौर्य और गुजरात से आरिफ घाटा, हमीद खान पठान, शाहिद कुरैशी व सादिक हसन समा को भी गिरफ्तार किया है। इन सभी पर ठगी की रकम को घुमाने और क्रिप्टो के जरिए अवैध लाभ कमाने का आरोप है।

11 लाख रूपये फ्रीज, जांच जारी

रतलाम पुलिस ने अब तक 11 लाख रुपये की राशि फ्रीज करवाई है। मुख्य खातों की फॉरेंसिक ट्रेसिंग में करोड़ों के संदिग्ध ट्रांजेक्शन सामने आए हैं। पुलिस का कहना है कि कई अन्य आरोपी अभी फरार हैं, जिनकी तलाश तेजी से जारी है।

पुलिस की चेतावनी: डिजिटल अरेस्ट से रहें सतर्क

एसपी अमित कुमार ने साफ कहा कि पुलिस या कोर्ट कभी भी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी या डिजिटल अरेस्ट नहीं करती। अनजान कॉल, फर्जी नोटिस और कथित अधिकारियों से डरकर कोई भी रकम ट्रांसफर न करें। यह कार्रवाई न सिर्फ रतलाम पुलिस की बड़ी सफलता है, बल्कि आम नागरिकों के लिए एक कड़ी चेतावनी भी है कि साइबर ठग अब नए और खतरनाक मनोवैज्ञानिक हथकंडे अपना रहे हैं।

जबलपुर से बांग्लादेशी घुसपैठियों की वापसी, कोर्ट के आदेश पर कोलकाता बॉर्डर से किया गया डिपोर्ट

अवैध रूप से भारत में घुसे बांग्लादेशी नागरिकों को जिला अदालत ने 4 साल की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने सजा को 2 साल करते हुए इन्हें बांग्लादेश डिपोर्ट करने के आदेश दिए है।

जबलपुर में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिक मिनारा बेगम और मोहम्मद मोसूर को आखिरकार भारत से वापस बांग्लादेश भेज दिया गया है। हाईकोर्ट के निर्देश पर दोनों को कोलकाता बॉर्डर के माध्यम से डिपोर्ट किया गया। इससे पहले जिला अदालत ने विदेशी नागरिक अधिनियम के तहत दोनों को चार-चार साल की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने घटाकर दो साल कर दिया और सजा पूरी होने के बाद डिपोर्ट करने के आदेश दिए थे।

साल 2023 में जबलपुर पुलिस ने की थी गिरफ्तारी

अभियोजन के अनुसार, 5 अप्रैल 2023 को गोरखपुर थाना पुलिस को सूचना मिली थी कि एक युवक और युवती अवैध रूप से जबलपुर क्षेत्र में रह रहे हैं। सूचना के आधार पर पुलिस ने महर्षि स्कूल के पास स्थित मैदान से दोनों को संदिग्ध अवस्था में पकड़ा। पूछताछ में उन्होंने अपने नाम मोहम्मद मोसूर उर्फ शेख (उम्र 38 वर्ष) और मिनारा बेगम (उम्र 23 वर्ष), निवासी बांग्लादेश बताए थे।पुलिस द्वारा पासपोर्ट, वीजा और किसी भी प्रकार का भारतीय पहचान पत्र मांगे जाने पर दोनों कोई भी वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। पूछताछ में उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि वे पिछले तीन-चार महीनों से जबलपुर में रह रहे थे। इसके बाद पुलिस ने विदेशी नागरिक अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया।

हाईकोर्ट का मानवीय और कानूनी संतुलन वाला आदेश

मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां सजा की अवधि पर पुनर्विचार किया गया। हाईकोर्ट ने चार साल की सजा को घटाकर दो साल कर दिया और निर्देश दिए कि सजा पूरी होने के बाद दोनों आरोपियों को उनके देश बांग्लादेश डिपोर्ट किया जाए। हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में संबंधित एजेंसियों ने प्रक्रिया पूरी करते हुए मिनारा बेगम और मोहम्मद मोसूर को कोलकाता बॉर्डर के जरिए बांग्लादेश भेज दिया। इस कार्रवाई के साथ जबलपुर में सामने आए बांग्लादेशी घुसपैठ के इस मामले का कानूनी अध्याय समाप्त हो गया।

जिला अदालत ने सुनाई थी चार-चार साल की सजा

मामले की सुनवाई के दौरान जिला न्यायालय ने पाया कि आरोपी भारतीय नागरिक होने का कोई भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाए। वहीं, गिरफ्तारी के समय उन्होंने स्वयं को बांग्लादेशी नागरिक बताया था। अपर सत्र न्यायाधीश विपिन सिंह भदौरिया की अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर दोनों को चार-चार साल के कठोर कारावास और दस-दस रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने सजा को 2 साल करते हुए इन घुसपैठियों को बांग्लादेश डिपोर्ट करने का आदेश जारी किया।

IAS गजेंद्र सिंह नागेश की ‘सरेआम सजा’ पर PM तक पहुँची शिकायत, नरसिंहपुर में युवक से मारपीट और पुरोहित से की थी अभद्रता

नरसिंहपुर में पदस्थ IAS अधिकारी गजेंद्र सिंह नागेश का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुँच गया है। वीडियो में अधिकारी युवक को थप्पड़ मारते और एक बुजुर्ग पुरोहित को ज़मीन में गाड़ने की धमकी देते नजर आ रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को सिविल सेवा आचरण नियमों और संविधान का उल्लंघन बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।

बरमान घाट का वायरल वीडियो, प्रशासनिक गरिमा पर गंभीर आघात

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के नर्मदा तट स्थित बरमान घाट से जुड़ा यह वीडियो इंटरनेट मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं IAS अधिकारी गजेंद्र सिंह नागेश आम नागरिकों के साथ अभद्र और कथित रूप से हिंसक व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं, जिससे प्रशासनिक गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

युवक को थप्पड़, बुजुर्ग पुरोहित को ‘ज़मीन में गाड़ने’ की धमकी

वीडियो में IAS अधिकारी एक युवक को खुलेआम थप्पड़ मारते नजर आते हैं। इसके साथ ही एक बुजुर्ग पुरोहित के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए उन्हें “ज़मीन में आधा गाड़ देने” की धमकी दी जाती है। मौके पर मौजूद अधिकारी का सुरक्षाकर्मी भी कथित रूप से मारपीट में शामिल दिखाई देता है, जिससे मामला और गंभीर हो गया है।

‘पेशाब क्यों किया?’— मौके पर ही खुद बन बैठे जज

वायरल फुटेज में यह भी सुना जा सकता है कि अधिकारी नर्मदा नदी के किनारे पेशाब करने को लेकर सवाल कर रहे हैं। आरोप है कि इस कथित अपराध पर IAS अधिकारी ने कानूनन प्रक्रिया अपनाने के बजाय मौके पर ही खुद को न्यायाधीश मानते हुए शारीरिक दंड देना शुरू कर दिया, जबकि ऐसे मामलों में केवल जुर्माना या वैधानिक कार्रवाई का प्रावधान है।

PM को भेजी गई शिकायत में सिविल सेवा आचरण अधिनियम के उल्लंघन का आरोप

मामले को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर के अधिवक्ता विवेक तिवारी ने प्रधानमंत्री को औपचारिक शिकायत भेजी है। शिकायत में कहा गया है कि इस प्रकार का आचरण सिविल सेवा आचरण नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है और एक IAS अधिकारी द्वारा पद की मर्यादा और शक्ति का दुरुपयोग किया गया है।

‘भारत में तालिबानी सजा का कोई प्रावधान नहीं’

अधिवक्ता विवेक तिवारी ने शिकायत में स्पष्ट किया गया है कि भारत में सजा देने का अधिकार केवल न्यायालयों को है। अपराध की स्थिति में सजा या तो जुर्माने के रूप में दी जाती है या न्यायिक प्रक्रिया के बाद जेल में निरुद्ध कर। खुले सार्वजनिक स्थान पर थप्पड़ मारना या धमकी देना भारतीय संविधान और विधि व्यवस्था के विपरीत है।

कैदियों को भी मानवाधिकार, फिर आम नागरिकों के साथ मारपीट क्यों?

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत में कैदियों तक को मानवाधिकार प्राप्त हैं। ऐसे में एक IAS अधिकारी द्वारा आम नागरिकों के साथ सार्वजनिक रूप से मारपीट और अपमानजनक व्यवहार करना न केवल गैरकानूनी बल्कि अमानवीय भी है।

प्रधानमंत्री से सख्त कार्रवाई की मांग, वीडियो पर संज्ञान लेने का आग्रह

अधिवक्ता विवेक तिवारी ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि वायरल वीडियो का स्वतः संज्ञान लेकर संबंधित IAS अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया जाए और विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में कोई अधिकारी कानून को अपने हाथ में लेने का साहस न कर सके।

देशभर में प्रशासनिक जवाबदेही पर बहस

यह प्रकरण अब केवल नरसिंहपुर तक सीमित नहीं रहा। प्रधानमंत्री तक शिकायत पहुँचने के बाद यह मामला देशभर में प्रशासनिक जवाबदेही, सिविल सेवा की मर्यादा और संविधान की सर्वोच्चता को लेकर नई बहस को जन्म दे रहा है।

RTO की कुर्सी पर बैठकर करोड़! ED ने संतोष पॉल की 3.38 करोड़ की संपत्ति की कुर्क

मध्य प्रदेश परिवहन विभाग में पदस्थ संतोष पॉल और उनकी पत्नी रेखा पॉल की कमाई और संपत्ति अब जांच एजेंसियों के कठघरे में है। आय के मुकाबले कई गुना अधिक संपत्ति, नकद लेन–देन का संदिग्ध पैटर्न और बैंक खातों की गहन पड़ताल ने मामले को गंभीर बना दिया है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने प्रशासनिक तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिकायत के बाद FIR और फिर कार्रवाई

प्रवर्तन निदेशालय (ED), भोपाल जोनल कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत यह कार्रवाई आर्थिक अपराध शाखा (EOW), भोपाल द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की। यह एफआईआर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराओं में दर्ज की गई थी, जिसमें क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO) संतोष पाल और वरिष्ठ लिपिक श्रीमती रेखा पाल पर अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगाए गए थे। ईडी ने एफआईआर के बाद मामले को मनी लॉन्ड्रिंग के दृष्टिकोण से जांच में लिया।

आय और संपत्ति का चौंकाने वाला अंतर

ईडी की विस्तृत जांच में सामने आया कि संतोष पाल और रेखा पाल की कुल सत्यापित वैधानिक आय लगभग 73.26 लाख रुपये थी। इसके विपरीत, जांच अवधि के दौरान उन्होंने करीब 4.80 करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित की और उस पर खर्च किया। एजेंसी के अनुसार, करीब 4.06 करोड़ रुपये की संपत्ति आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक पाई गई, जिसे स्पष्ट रूप से Disproportionate Assets की श्रेणी में रखा गया।

नकद जमा और EMI से जुड़ा संदिग्ध पैटर्न

जांच के दौरान बैंक खातों के विश्लेषण में एक खास पैटर्न सामने आया। ईडी के अनुसार, आरोपियों के खातों में बार-बार बड़ी मात्रा में नकद जमा किया गया, और ये जमा प्रायः लोन की EMI चुकाने से ठीक पहले किए जाते थे। जांच एजेंसी का मानना है कि यह तरीका बैंकिंग प्रणाली के जरिए बिना हिसाब की नकदी को खपाने और वैध दिखाने की मंशा को दर्शाता है, जो मनी लॉन्ड्रिंग की एक सामान्य कार्यप्रणाली मानी जाती है।

इन संपत्तियों पर चला ईडी का चाबुक

ईडी ने जांच के आधार पर लगभग 3.38 करोड़ रुपये मूल्य की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है। इन संपत्तियों में जबलपुर जिले में स्थित आवासीय मकान, आवासीय प्लॉट, कृषि भूमि और व्यावसायिक दुकानें शामिल हैं। जांच एजेंसी ने इन सभी अचल संपत्तियों को “अपराध की आय” (Proceeds of Crime) मानते हुए PMLA के तहत कार्रवाई की है।

PMLA के तहत आगे क्या हो सकता है

कानूनी जानकारों के अनुसार, अस्थायी कुर्की के बाद यदि आरोप साबित होते हैं, तो ये संपत्तियां स्थायी रूप से जब्त की जा सकती हैं। साथ ही, मामले में ईडी द्वारा अभियोजन की कार्रवाई भी की जा सकती है, जिससे आरोपियों को लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है। यह मामला न केवल व्यक्तिगत स्तर पर, बल्कि पूरे परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

ED की सख्ती लेकिन अभी भी पद पर संतोष पॉल

ईडी की यह कार्रवाई यह संकेत देती है कि आय से अधिक संपत्ति और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियां अब और अधिक सख्त रुख अपना रही हैं। परिवहन जैसे संवेदनशील विभाग में हुई इस कार्रवाई को प्रशासनिक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अहम कदम के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है की परिवहन विभाग के द्वारा संतोष पॉल कट ट्रांसफर वापस जबलपुर कर दिया गया है। हालांकि उन्हें विभाग के कानूनी मामले देखने के लिए प्रभार दिया गया है, लेकिन जानकारी के अनुसार वह खुद जबलपुर RTO बने बैठे हैं और RTO के अधिकार क्षेत्र के आदेश भी जारी कर रहे हैं।

हनुमानताल थाने पर फर्जी FIR का गंभीर आरोप, अधिवक्ता संघ से की गई शिकायत

जबलपुर के हनुमानताल थाने पर एक बार फिर गंभीर आरोप लगे हैं, जहां एक अधिवक्ता के खिलाफ फर्जी FIR दर्ज करने का मामला सामने आया है। आरोप है कि मारपीट की शिकायत दर्ज कराने के बाद थाने में ही बैठे अधिवक्ता पर काउंटर केस दर्ज कर दबाव बनाया गया। एक ही तारीख की घटना दिखाकर दर्ज की गई दो FIRs ने पुलिस की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

जबलपुर के हनुमानताल थाना क्षेत्र में पुलिस कार्यप्रणाली को लेकर एक और बड़ा विवाद सामने आया है। अवैध शराब बिक्री को संरक्षण देने के आरोपों से पहले ही घिरे हनुमानताल थाने पर अब एक अधिवक्ता के खिलाफ थाने में बैठे-बैठे फर्जी FIR दर्ज करने का आरोप लगा है। मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि पीड़ित कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि पेशे से अधिवक्ता हैं, जिन्होंने पुलिस पर दबाव बनाकर झूठा काउंटर केस दर्ज करने का आरोप लगाया है।

हमले की FIR के बाद अधिवक्ता पर ही दर्ज हो गया काउंटर केस

मामला 22 नवंबर की रात का है। अधिवक्ता दिनेश गुप्ता के घर के बाहर कुछ लोग पटाखे फोड़ रहे थे। जब उन्होंने दरवाजे के सामने पटाखे फोड़ने से मना किया तो आरोपी आक्रोशित हो गए और अधिवक्ता व उनके परिवार के साथ मारपीट कर दी। इस घटना की शिकायत पर हनुमानताल थाना पुलिस ने उसी रात लगभग 11 बजे अनुज रैकवार, मनोज वंशकार, विनोद, आयुष और कंचन रैकवार के खिलाफ FIR दर्ज की।
लेकिन हैरानी की बात यह रही कि अगले ही दिन 23 नवंबर की रात करीब 9:30 बजे पुलिस ने उसी अधिवक्ता के खिलाफ काउंटर FIR दर्ज कर ली। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज काउंटर केस में भी घटना की तारीख 22 नवंबर ही दर्शाई गई, जबकि शिकायत एक दिन बाद की बताई जा रही है।

सेटअप कर थाने में ही दर्ज की गई फर्जी FIR – अधिवक्ता का आरोप

अधिवक्ता दिनेश गुप्ता का आरोप है कि जब वे अपनी FIR दर्ज कराने के बाद थाने में ही मौजूद थे, उसी दौरान पुलिस ने दबाव बनाने के उद्देश्य से दूसरे पक्ष की झूठी शिकायत लेकर उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। उनका कहना है कि यदि वास्तव में दूसरी घटना हुई होती, तो एक दिन बाद शिकायत दर्ज कराने और उसी तारीख को घटना दर्शाने का कोई औचित्य नहीं बनता। अधिवक्ता ने इस पूरी कार्यवाही को जानबूझकर किया गया पुलिसिया सेटअप करार दिया है।

अधिवक्ता संघ को दी गई मामले की शिकायत

इस मामले को लेकर अधिवक्ता ने जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष मनीष मिश्रा को लिखित शिकायत सौंपी है। मनीष मिश्रा ने बताया कि इस विषय में पुलिस अधीक्षक सहित हनुमानताल थाना प्रभारी से बातचीत की गई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि यह साबित होता है कि थाना प्रभारी के संरक्षण में फर्जी कार्यवाही की गई है, तो अधिवक्ता संघ उग्र आंदोलन करने से पीछे नहीं हटेगा। अधिवक्ता संघ ने इस मामले को न्याय व्यवस्था और अधिवक्ताओं की सुरक्षा से जोड़कर देखा है।

थाना प्रभारी की सफाई, लेकिन FIR की तारीख ने बढ़ाया संदेह

वहीं हनुमानताल थाना प्रभारी का कहना है कि अधिवक्ता की शिकायत के दूसरे दिन दोबारा विवाद हुआ था, जिसके बाद दूसरे पक्ष की शिकायत पर काउंटर मामला दर्ज किया गया। हालांकि उनकी यह सफाई खुद सवालों के घेरे में है, क्योंकि FIR में घटना की तारीख 22 नवम्बर ही दर्ज है, न कि 23 नवंबर। यही विरोधाभास पुलिस की भूमिका पर गंभीर संदेह खड़ा कर रहा है।